श्री अशफ़ाक़ उल्ला खाँ – मैं मुसलमान तुम क़ाफ़िर

 

इस तरह की अपनी कुर्बानियों से  वतन  की  मिट्टी – पानी  का  कर्ज़  अदा  करने  वाले  सिरफिरे  मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के उपखँड नाम से दिये परिशिष्ठ मे श्री बिस्मिल की चर्चा के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ साहब का शेष आगे..>

मालिक तेरी रजा रहे बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे

जहाँ  तक  मैं  समझता  हूँ  कि  पिछली सँदर्भित  कड़ी  सहित  परिचय श्रृँखला  की  यह  कड़ियाँ  सँभवतः  श्री भगवतीचरण वर्मा के कनिष्ठ भ्राता और बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र श्री शिव वर्मा ने या क्राँति-दल के साथियों ने सामूहिक रूप से मिलजुल कर तैयार की होगी । यह तो सर्वविदित है कि बिस्मिल जी ने यह शेष आगे..>

पुनरागमन बिस्मिल आत्मकथ्य- और इसके पहले

इससे पहले कि मैं आत्मकथा की कड़ियों का पुनःप्रकाशन आरँभ करूँ, मैं  देश  के  गौरव  अमर  हुतात्मा के सम्मुख क्षमादान माँगते हुये नतमस्तक हूँ । उस  समय  जबकि  इस  आत्मकथा का  प्रवाह अपने  अँतिम  चरण  में  था, इसका अनायास रुक जाना क्षम्य नहीं है । 25 अगस्त  2009 के बाद से आज तक इनका प्रकाशन शेष आगे..>

श्री रामप्रसाद बिस्मिल

अमर शहीद की अँतिम नोट से इस आत्मकथ्य का पटाक्षेप नहीं होता । इसके उपराँत एक लघुखण्ड ’ विशेष परिचय’ का है । इसमें काकोरी काँड के लगभग सभी पात्रों का परिचयात्मक वर्णन है । यह तो स्पष्ट है कि, श्री बिस्मिल जी ने इसे स्वयँ न लिखा होगा । मेरा अनुमान है कि, स्व० शेष आगे..>

वो कवितायें, जो मुझे प्रिय रही हैं !

अब तक आपने पढ़ा.. “ वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अग्रिम कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनाना चाहिये । शेष आगे..>

गये थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई ।

अब तक आपने पढ़ा.. “ यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ? इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है शेष आगे..>

राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।

अब तक आपने पढ़ा…  उनको  उचित  है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता  प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और  उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।  इसके आगे स्व० बिस्मिल लिखते हैं..
जो धनी मानी स्वदेश सेवार्थ बड़े-बड़े विद्यालयों तथा पाठशालाओं की स्थापना करते शेष आगे..>

यह कैसा भारतवर्ष है

अब तक आपने पढ़ा … “ मैं इस समय इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि यदि हम लोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो  हमारा  उद्योग  क्रान्तिकारी  आन्दोलन  से  कहीं  अधिक  लाभदायक होता, जिसका  परिणाम  स्थायी  होता । अति उत्तम होगा कि भारत की भावी सन्तान तथा नवयुवक शेष आगे..>

अच्छा हुआ जो मैं गिरफतार हो गया और भागा नही

अब विचारने की बात यह कि भारतवर्षमें क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन से साधन मौजूद है ?
 गत पृष्ठों में मैंने अपने अनुभवों का उल्लेख करके दिखला दिया है कि समिति के सदस्यों को उदर-पूर्ति तक के लिये कितना कष्ट उठाना पड़ा । प्राण-पण से चेष्टा करने पर भी असहयोग आन्दोलन के पश्चात कुछ थोड़े से शेष आगे..>